सामाजिक समस्या
सामाजिक समस्या
वस्तुतः एक नवीन विषय के रूप में समाजशास्त्र के उद्भव, विकास एवं परिवर्तन की पृष्ठभूमि में सामाजिक समस्या(सामाजिक मुद्दा या सामाजिक समस्या) की अवधारणा ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। समाजशास्त्र का विकास समस्यामूलक परिवेश एवं परिस्थितियों का अध्ययन करने एवं इनका निराकरण करने के प्रयासों के रूप में हुआ है। सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में सामाजिक विचारकों का ध्यान सहज रूप से इसलिए आकर्षित हुआ है क्योंकि ये सामाजिक जीवन का अविभाज्य अंग है। मानव समाज न तो कभी सामाजिक समस्याओं से पूर्ण मुक्त रहा है और न ही रहने की सम्भावना निकट भविष्य में नजर आती है, परन्तु इतना तो निश्चित है कि आधुनिक समय में विद्यमान संचार की क्रान्ति तथा शिक्षा के प्रति लोगों की जागरूकता के फलस्वरूप मनुष्य इन समस्याओं के प्रति संवेदनशील एवं सजग हो गया है। सामाजिक समस्याओं के प्रति लेगों का ध्यान आकर्षित करने में जन संचार के माध्यम, यथा-टेलीविजन, अखबार एवं रेडियो ने अति महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। मुख्यतः टेलीविजन पर प्रसारित विभिन्न चेनलों के कार्यक्रमों तथा स्थानीय, प्रादेशिक एवं अन्तर्राज्यीय अखबारों की भूमिका प्रशंसनीय है।
भारत में सामाजिक मुद्दे
भारत एक प्राचीन देश है, कुछ अनुमानों के अनुसार भारतीय सभ्यता लगभग 5 हजार वर्ष पुरानी है, इसलिये इसका समाज भी बहुत पुराना और जटिल प्रकृति का है। अपनी लम्बी ऐतिहासिक अवधि के दौरान, भारत बहुत से उतार-चढ़ावों और अप्रवासियों के आगमन का गवाह हैं; जैसे: आर्यों का आगमन, मुस्लिमों का आगमन आदि। ये लोग अपने साथ अपनी जातिय बहुरुपता और संस्कृति को लेकर आये साथ ही भारत की विविधता, समृद्धि व जीवन शक्ति में अपना योगदान दिया।
इसलिये, भारतीय समाज विविध संस्कृतियों, लोगों, विश्वासों, मान्यताओं का जटिल मिश्रण हैं जो शायद कहीं से भी आया हो लेकिन अब इस विशाल देश का एक अभिन्न हिस्सा है। इस जटिलता और समृद्धि ने भारतीय समाज को एक जीवंत और रंगीन संस्कृति का अद्वितीय रुप दिया है।
सामाजिक बुराईयों के कारण
लेकिन यही जटिलता अपने साथ बहुत सी सामाजिक समस्याओं और मुद्दों की जटिल प्रकृति को सामने लाती हैं। वास्तव में पूरे संसार के प्रत्येक समाज में भारतीय समाज की ही तरह अपने अलग-अलग सामाजिक मुद्दे होते हैं। भारतीय समाज बहुत गहराई से धार्मिक विश्वासों से जुड़ा हुआ है; यहाँ विभिन्न धार्मिक विश्वासों को मानने वाले लोग रहते हैं जैसे: हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, पारसी आदि। ये सभी देश की सामाजिक-सांस्कृतिक किस्मों में जुड़ती हैं। भारतीय सामाजिक समस्याएं भी लोगों की धार्मिक प्रथाओं और विश्वासों में निहित हैं। लगभग सभी सामाजिक मुद्दों और समस्याओं की उत्पत्ति भारत के लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं से होती हैं। ये सामाजिक समस्याऐं बहुत लम्बे समय से विकसित हुई हैं और अभी भी अलग रुप में जारी हैं।
भारत में सामाजिक मुद्दों के रुप
गरीबी वो स्थिति है जिसमें एक परिवार जीने के लिये अपनी आधारभूत जरुरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं होता है; जैसे: खाना, वस्त्र और घर। भारत में गरीबी विशाल स्तर पर फैली हुई स्थिति है। स्वतंत्रता के समय से, गरीबी एक प्रचलित चिंता का विषय है। ये 21वीं शताब्दी है और गरीबी आज भी देश में लगातार खतरा के रुप में बनी हुई है। भारत ऐसा देश है जहाँ अमीर और गरीब के बीच बहुत व्यापक असमानता है। इसे ध्यान में रखा जाना चाहिये कि यद्यपि पिछले दो दशकों में अर्थव्यवस्था में प्रगति के कुछ लक्षण दिखाये दिये हैं, ये प्रगति विभिन्न क्षेत्रों या भागों में असमान हैं। वृद्धि दर बिहार और उत्तर प्रदेश की तुलना में गुजरात और दिल्ली में ऊँची हैं। लगभग आधी जनसंख्या के पास रहने के लिये पर्याप्त आवास नहीं हैं, सभ्य स्वच्छता प्रणाली तक पहुँच, गाँवों में पानी का स्त्रोत कोई नहीं हैं साथ ही माध्यमिक विद्यालय भी नहीं है और ना ही उपयुक्त रास्तें हैं। यहाँ तक कि दलितों की तरह ही समाज के कुछ वर्ग सरकार द्वारा नियुक्त संबंधित अधिकारी वर्ग द्वारा अनुरक्षित गरीबी सूची में शामिल भी नहीं किये गये हैं। वो समूह जो सामाजिक रुप से अलग रख दिये गये हैं।
अशिक्षा वो स्थिति है जो राष्ट्र के विकास पर एक धब्बा बन गयी है। भारत बहुत बड़ी अशिक्षित जनसंख्या को धारण करता है। भारत में अशिक्षा वो समस्या है जो इससे जुड़े बहुत से जटिल परिणाम रखती है। भारत में अशिक्षा लगभग देश में विद्यमान असमानताओं के विभिन्न रुपों के साथ संबंधित हैं। देश में व्याप्त असाक्षरता की दर को लिंग असन्तुलन, आय असंतुलन, राज्य असंतुलन, जाति असंतुलन, तकनीकी बाधाएँ आदि आकार दे रही हैं। भारतीय सरकार ने असाक्षरता के खतरे का मुकाबला करने के लिये बहुत सी योजनाओं को लागू किया लेकिन स्वच्छता की घटिया परिस्थितियों, महंगी निजी शिक्षा, दोषपूर्ण मिड-डे मील योजना के कारण अशिक्षा अभी भी अस्तित्व में हैं। केवल सरकार को ही नहीं बल्कि प्रत्येक साक्षर व्यक्ति को भी असाक्षरता के उन्मूलन को व्यक्तिगत लक्ष्य के रुप में स्वीकार करना चाहिये। सभी साक्षर व्यक्तियों द्वारा किये गये सभी प्रयास इस खतरे के उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत बाल विवाह की दूसरी बड़ी संख्या रखता है। शादी को दो परिपक्व (बालिग) व्यक्तियों की आपसी सहमति से बना पवित्र मिलन माना जाता है जो पूरे जीवनभर के लिये एक-दूसरे की सभी जिम्मेदारियों को स्वीकार करने के लिये तैयार होते हैं। इस सन्दर्भ में बाल विवाह का होना अनुचित प्रथा है। बाल-विवाह बचपन की मासूमियत की हत्या है। भारतीय संविधान में बाल-विवाह के खिलाफ कई कानूनों और अधिनियमों का निर्माण किया गया है। बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 पहला कानून था जिसे जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत में लागू किया गया था। ये अधिनियम बालिग लड़के और लड़कियों की उम्र को परिभाषित करता है। इसके साथ ही नाबालिग के साथ यौन संबंध भारतीय दंड संहिता (इण्डियन पैनल कोड) की धारा 376 के अन्तर्गत एक दण्डनीय अपराध है। इस मुख्य परिवर्तन के लिये उचित मीडिया संवेदीकरण की आवश्यकता है। वहीं दूसरी तरफ, ये माना गया है कि बाल-विवाह को जड़ से खत्म करने, वास्तविक प्रयासों, सख्ती के कानून लागू करने के साथ ही अभी भी लगभग 50 साल लगेंगे तब जाकर कहीं परिदृश्य को बदला जा सकता है।
भुखमरी कैलोरी ऊर्जा खपत में कमी की स्थिति को प्रदर्शित करती है, ये कुपोषण का एक गंभीर रुप है जिसकी यदि देखभाल नहीं की गयी तो अन्ततः मौत की ओर ले जाता है। ऐतिहासिक रुप से, भुखमरी भारत से अलग विभिन्न मानव संस्कृतियों में स्थिर हो चुकी है। भुखमरी किसी भी देश में बहुत से कारणों से जन्म लेती है जैसे युद्ध, अकाल, अमीर-गरीब के बीच असमानता आदि। कुपोषण की स्थिति जैसे बच्चों को होने वाली बीमारी क्वाशियोरकॉर और सूखा रोग, अकाल या भुखमरी के कारण उत्पन्न गंभीर समस्या हैं। सामान्यतः, क्वाशियोरकॉर और सूखा रोग उन परिस्थियों में होता है जब लोग ऐसा आहार लेते हैं जिसमें पोषक तत्वों (प्रोटीन, मिनरल्स, कार्बोहाइड्रेड, वसा और फाइबर) की कमी हो। भारत के संदर्भ में ये कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि ये भोजन प्रणाली के वितरण की दोषपूर्ण व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दशकों में एक आदेश पारित करते हुये सरकार को मिड-डे मील योजना और गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य के लिये आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिये हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल जो आस-पास के गरीबों की पहचान, कष्टों एव विपत्तियों यन्त्र(ये शब्द किसके संदर्भ में है) और बच्चों के अधिकारों के सन्दर्भ में किये गये वादों और कार्यों को पूरा करने के लिये इसके मापक के रुप ये अधिनियम में मील का पत्थर बना गया है। ये बिल भी पूर्णतया दोष रहित नहीं हैं। लाभार्थियों की पहचान के संबंध में स्पष्ट तंत्र में परिभाषित नहीं किया गया है। गरीबी निर्धारण के संकेतकों को विशिष्ट बनाने की आवश्यकता थी जो इस बिल में बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है।
बाल श्रम से आशय बच्चों द्वारा किसी भी काम को बिना किसी प्रकार का वेतन दिये कार्य कराना है। बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है। जहाँ तक भारत का संबंध है, ये मुद्दा दोषपूर्ण है क्योंकि ऐतिहासिक काल से यहाँ बच्चें अपने माता-पिता के साथ उनकी खेतों और अन्य कार्यों में मदद कराते हैं। अधिक जनसंख्या, अशिक्षा, गरीबी, ऋण-जाल आदि सामान्य कारण इस मुद्दे के प्रमुख सहायक हैं। जिम्मेदारी से दबें तथा ऋणग्रस्त माता-पिता अपनी परेशानियों के दबाव के कारण सामान्य बचपन के महत्व को नहीं समझ पाते हैं, जो बच्चों के मस्तिष्क में घटिया भावनाओं और मानसिक सन्तुलन का नेतृत्व करता है और जो कठोर क्षेत्र या घरेलू कार्यों को शुरू करने के लिए तैयार नहीं है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी बच्चों को कपड़ों का निर्माण करने वाली कम्पनियों में काम करने के लिये रखती है और कम वेतन देती है जो बिल्कुल ही अनैतिक है। बाल श्रम वैश्विक चिन्ता का विषय है जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्याप्त है। बच्चों का अवैध व्यापार, गरीबी का उन्मूलन, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा और जीवन के बुनियादी मानक बहुत हद तक इस समस्या को बढ़ने से रोक सकते हैं। विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष गरीबी के उन्मूलन के लिये विकासशील देशों को ऋण प्रदान करके मदद करता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनी और अन्य संस्थाओं के द्वारा शोषण को रोकने के लिये श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करना अनिवार्य है।
भारत में आज भी समलैंगिकता को निषेध माना जाता हैं। आज भारत प्रभावशाली वृद्धि दर के साथ तेजी से विकास करने वाला विकासशील देश है। लेकिन क्या वृद्धि दर ही भारत के विकासशील देश होने का दावा करने के लिये पर्याप्त है? एक राष्ट्र की विशेषता इस बात में भी निहित है कि वो अपने देश के लोगों से कैसे व्यवहार करता है। इस विशेषाधिकार के सन्दर्भ में, भारत का समलैंगिकता के मुद्दे पर रवैया निश्चित ही उचित नहीं है। समलैंगिकता समाज के कई वर्गों में एक बीमारी मानी जाती है और समाज में बहुत कम वर्ग हैं जो समलैंगिकता को स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि समलैंगिकता भारत में दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। समलैंगिकता 1861 के कानून की तरह आज भी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अन्तर्गत एक दस साल के कारावास के साथ दंडनीय अपराध है जिसने सभी लोगों को ये विश्वास करना कठिन बना दिया है कि भारत एक विकासशील राज्य है और हम 21वीं सदी के निवासी हैं। यद्यपि, ये विषय 2009 में प्रकाश में आया था जब दिल्ली हाई कोर्ट ने दो वयस्कों की परस्पर सहमति से बनाये गये समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी थी कि इसे दंडनीय अपराध बनाया जाना मौलिक मानवाधिकारों के उल्लंघन करने का रास्ता देना है जिसके परिणाम स्वरुप समलैंगिकता अधिकार को प्रेरक शक्ति संघर्ष के रुप में संस्थाएँ अस्तित्व में आयी।
वर्तमान परिदृश्य:
हम संसार में अपने देश को आधुनिक, आगे बढ़ते हुये राष्ट्र के रुप में प्रस्तुत करते हैं और ये सत्य है कि भारत दुनिया में, वैज्ञानिक, आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में प्रोत्साहन और उन्नति के साथ एक राष्ट्र के रूप में प्रगति कर रहा है, लेकिन जहाँ तक सामाजिक विकास का संबंध है, यह अभी भी दुनिया के सबसे कम रैंक के साथ नीचे स्तर के देशों में से एक है। भारत के मानव विकास सूचकांक (एचडीआई), 2013 की रिपोर्ट के अनुसार इसे कुल 187 देशों में से 135वाँ स्थान दिया गया है। ये भारत की सामाजिक संकेतकों में खेदजनक स्थिति को प्रदर्शित करता है। इससे ये भी दिखाई देता है कि हम आज भी रुढ़िवादी मान्यताओं, विश्वासों के नकारात्मक दृष्टिकोण के समाज के रुप में हैं जो समानता और भाईचारे के सिद्धान्त में विश्वास नहीं करता है।
:- आनंद श्री कृष्णन
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